विशिष्‍ट व्‍याख्‍यान

सीएसआईआर-आईजीआईबी विशिष्‍ट व्‍याख्‍यान श्रृंखला शुरू कर रहा है जिसका लक्ष्य शैक्षणिक, कारोबारी, कला और नागरिक समाज के उच्‍च क्षमतावान लोगों को हमारे कैंपस तक लाने और छात्रों के साथ अपने विचारों को साझा करने के लिए प्रोत्‍साहित करना है। यह श्रृंखला हमारे छात्रों में अनुसंधान अनुभव को प्रोत्‍साहित और समृद्ध बनाने तथा विस्‍तार रूप एवं नए विचारों का उत्प्रेरित करने और भिन्‍न रूप में युवा पीढ़ी को सोचने के लिए प्रोत्‍साहित करने के प्रयास का एक भाग है।
 
पूर्व के व्‍याख्‍यान
 

6 मार्च, 2014, 4:00 बजे सायं, सीएसआईआर-आईजीआईबी, मथुरा रोड कैंपस

प्रो. पी. बलराम

प्रो. पी. बलराम
निदेशक
भारतीय विज्ञान संस्‍थान
बंगलोर - 560 012 भारत

 
प्रो. बलराम का अनुसंधान का मुख्‍य क्षेत्र डिजाइनयुक्‍त और प्राकृतिक पेप्‍टाइडों की संरचना, बनावट और जैविक क्रियाकलाप की जांच रहा है। ऐसा करने के लिए उन्‍होंने एक्‍सरे क्रिस्‍टलोग्राफी के साथ न्‍यूकलियर मैगनेटिक रिसोनेंस स्‍पेक्‍ट्रोस्‍कोपी, इंफ्रारेड स्‍पेक्‍ट्रोस्‍कोपी और सर्कुलर डाइक्रोइज्‍म जैसी तकनीकों का व्‍यापक इस्‍तेमाल किया है। डिजाइन युक्‍त पेप्‍टाइडों के मोड़ और आकार को प्रभावित करने वाले कारकों के मूल्‍यांकन में उनका बड़ा योगदान रहा है और हेलिक्‍स, बिटा टर्न्स और शीट्स जैसे द्धितीयक अवसंरचनात्मक मोटिफों के बनने में अहम भूमिका निभाने वाले संरचनात्‍मक तत्‍वों की जांच की है। सदैव सहयोगी के रूप में इसाबेला कार्ले के साथ उन्‍होंने हेलिसिटी को उत्‍प्रेरित करने और बनाए रखने व पेपटाइड आकार को निरूद्ध करने में अल्‍फा एमिनो आइसोब्‍यूटेरिक एसिड के इस्‍तेमाल में वे सिद्धहस्‍त रहे हैं।


उनके प्रमुख पुरस्‍कार:
पद्मश्री, पद्मभूषण

13 नवम्बकर, 2013 को 3:00 बजे दोपहर, सीएसआईआर- आईजीआईबी मथुरा रोड कैंपस

के. श्रीकुमारन नायर

एसडी, पीएच.डी. प्रोफेसर ऑफ मेडिसिन, मायो फाउंडेशन
क्लीनिसियन इन्वेस्टिगेटर कंसल्टेंट, इंडोक्रिनोलॉजी एंड मेटाबोलिज्म
मायो क्लीनिक, रोकेस्टर, एमएन

 
डा. नायर का अनुसंधान कार्यक्रम मधुमेह और बुढ़ापा में उर्जा उपपाचन की भूमिका और परिवर्तित प्रोटीन हस्तांतरण के महत्व् पर केन्द्रित है। वर्तमान परियोजनाओं से यह समाधान होना है कि क्या क्षतिग्रस्त और परिवर्धित प्रोटीन का जमाव परिवर्तित प्रोटीन हस्तांतरण और उन कारकों से जुड़ा है जो इंसुलिन प्रतिरोध और कार्डियोवास्कूलर जटिलताओं जैसे सह-रग्णताएं उत्पन्नर कर सकता है।

उनके शब्दं:
टाइप 2 डाइबिटीज एक पुराना रोग है किंतु इसमें बढ़ोतरी हो रही है और 21वीं सदी में यह एक बड़ी स्वास्थ्य समस्या होगी। वैश्विक डाइबिटीज महामारी के कारणों को स्पष्ट करने के लिए जीनों, प्रोटीनों और उपपाचन के नियमन में बदलाव के साथ आयु और जीवन जीने के तरीके में बदलाव के साथ परस्पर क्रिया को समझना सबसे प्रमुख है।
 

6मई, 2013 को 3:00 बजे अपराह्न सीएसआईआर-आईजीआईबी मथुरा रोड कैंपस

इंदर एम. वर्मा

प्रोफेसर इरविन एंड जॉन जेकोब चेयर इन एक्जेम्पलरी लाइफ साइंस
अमेरिका कैंसर सोसाइटी प्रोफेसर ऑफ मोलेकुलर बायोलॉजी. द साल्क इंस्टीच्यूट लेबोरेटोरी ऑफ जेनेटिक्सक

 
इंदर एम. वर्मा जो लेबोरेटोरी ऑफ जेनेटिक एंड अमेरिकी कैंसर सोसाइटी प्रोफेसर ऑफ मोलेकुलर बायोलॉजी में प्रोफेसर हैं, जीन थेरेपी वेक्टतर हेतु जीवाणुओं के विकास के संबंध में विश्व के प्रमुख वैज्ञानिक हैं। डा. वर्मा नई जीनों को डालने के लिए आनुवांशिक रूप से वर्धित जीवाणुओं को उपयोग में लाते हैं जिन्हें उस शरीर में वापस किया जा सकता है जहां वे आवश्यनक प्रोटीन तैयार करते हैं जिनके नहीं रहने पर बीमारी होती है।

व्यक्तिगत वक्तव्य:
मेरी प्रयोगशाला को कैंसर बायोलॉजी, जीन स्थानांतरण तकनीकों और बायोलॉजी आफ इन्फ्लेमेश्न के सामान्य क्षेत्र में अभिरूचि है। पिछले 35 वर्षों से मैंने अपने प्रयोगशाला में 100 से अधिक प्रशिक्षुओं का सहयोग किया है और मुझे युवा अनुसंधानकर्ताओं के भविष्य की निगरानी में आनंद आता है ताकि वे स्वंतंत्र वैज्ञानिक बन सकें। मैं अधिक न्वोन्मेषी और साहसिक अनुसंधान करने के लिए युवा वैज्ञानिकों को प्रोत्सााहित करता रहता हूं।